Thursday, June 17, 2010

रथ के पहिये

दिल रोया ना आंखें बरसीं ,
तुम आये ना सांसें ठहरीं।


ख्वाबों पर भी तेरा बस है ,
तनहाई में तू ही दिखती।

मिल जाये जो दीद तुम्हारी ,
कल ईद हमारी भी मनती।

मजबूत सफ़ीना है तेरा ,
जर्जर सी है मेरी कश्ती ।

मन्ज़ूर मुझे डूबना लेकिन ,
दिल की नदियां है कहां गहरी।

सब्र चराग़ों सा रखता मैं ,
ज़ुल्मी हवायें तुमसे डरतीं ।

अर्श सियासत की छोड़ न तू,
मर जायेगी जनता प्यासी ।

वादा तूने तोडा है पर ,
तुहमत में है मेरी हस्ती ।

तेरा घर मेरा मंदिर है ,
मेरी जान वहीं है अटकी।

रथ के दो पहिये हम दोनों ,
तू ही हरदम आगे चलती।

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