राहे मुहब्बत दर्द से भरर्पूर है, अब बे-वफ़ाई इश्क़ का दस्तूर है।
दिल के समन्दर मे वफ़ा की कश्ती है, आंखों के साग़र को हवस मन्ज़ूर है।
ग़म के चमन की रोज़ सजदे करता हूं, पतझ्ड़ के व्होठों मे मेरा ही नूर है।
बारिश का मौसम रुख पे आया इस तरह, ज़ुल्फ़ों का तेरा साया भी मग़रूर है।
दिल के चरागों को जला कर बैठा हूं , अब आंधियों का हुस्न बे-नूर है।
जब से नदी के पास ये दिल बैठा है , मेरे सफ़र की प्यास मुझसे दूर है।
दिल राम को तरज़ीह देता है मगर ,मन रावणी क्र्त्यों मे मग़रूर है।
चाले सियासत की तेरी ज़ुल्फ़ों सी है , जनता उलझने को सदा मजबूर है।
Thursday, June 3, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment