मजबूरी कुछ तो होगी जो हमसे जुदा हुवे,तुम इश्क़ की ग़ुनाहों से फ़िर क्यूं खफ़ा हुवे।
तुम ज़िन्दगी निभाती हो जीती कहां हो यार, कर प्यार हमसे ग़ैर के दिल की दुआ हुवे।
मन्ज़ूर है लबों पे समन्दर की आग तुम , तो सर्द साहिलों की हंसी से रज़ा हुवे।
जुर्मे- हवस मे डूबी रही सर से पैर तक।, हम सब्र की अदालतों का फ़ैसला हुवे ।
ता-उम्र तुमने सिर्फ़ अंधेरा दिया मुझे , हम भी उजालों के लिये कब बावरा हुवे।
तक़दीर मे सिपाही बनना था बन गये , पर रंगे-खून पे कभी ना हम फ़िदा हुवे।
जर्जर है इस ग़रीब के छत की कमानियां , बारिश मे राजनीति का हम मुद्दआ हुवे।
महफ़ूज़ है चरागों का दरबार दिल मे इस हम आंधियों के दर्द का भी रास्ता हुवे
a few seconds ago · प्रविष्टि संपादित करें · Delete Post
Wednesday, June 2, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment