आईनों से नहीं है दुशमनी मेरी । अक्श से अपनी डरती ज़िन्दगी मेरी।
हुस्न ही है मुसीबत का सबब मेरा,क्यूं इबादत करे फ़िर बे-खुदी मेरी ।
साहिलों की अदा मंझधार के दम से,लहरों को पेश हरदम बन्दगी मेरी ।
घर वतन छोड़ आया हुस्न के पीछे,आज खुद पे हंसे सरकशी मेरी ।
सूर्य से कूम नज़र लड़ाई थी,है खफ़ा नज़रों से अब रौशनी मेरी ।
सब्ज गुलशन समझ बैठा मै सहरा को ,अब कहां से बुझेगी तशनगी मेरी।
शमा के प्यार मे मै जल चुका इतना,मर के अब रो रही है खुदकुशी मेरी ।
मै बड़ी से बड़ी खुशियों को पकड़ लाया ,दूर जाती गई छोती खुशी मेरी।
तू नहीं तो नशा कफ़ूर है दानी ,इक नज़र ही तुम्हरी मयकशी मेरी ।
Friday, June 11, 2010
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