मुझपे फिर उनकी, दुवाओं का असर है,
मेरा दिल फिर आज उजड़ा नगर है।
नौकरी परदेश में गो कर रहा पर ,
यादों के दरिया में डूबा मेरा घर है।
गंगा भ्रष्टाचार की बहने लगी है,
इसलिये महंगाई का सर भी उपर है।
तुम सख़ावत की सियासत सीखना मत,
ये अमीरों की डकैती का हुनर है।
राम का नाम जपते हैं सदा पर,
रावणी क्रित्यों से थोड़ा भी न डर है।
झोपड़ी कालोनी में तन्हा है जबसे,
बिल्डरों की उसपे लालच की नज़र है।
ग़म चराग़े दिल का बढ्ता जा रहा है,
बेरहम मन में तसल्ली अब सिफ़र है।
देख मेरे इश्क़ का उतरा चेहरा,
आंसुओं से आईना ख़ुद तर-ब-तर है।
ख़्वाबों में भी सोचो मत उन्नति वतन की,
मच्छरों को मारना ही उम्र भर है।
प्यार है भैसों से नेता आफ़िसर को,
खातिरे इंसां , व्यवस्था अब लचर है।
बेवफ़ाई हावी है दानी वफ़ा पर,
इक ज़माने से यही ताज़ा ख़बर है
Saturday, August 14, 2010
Saturday, August 7, 2010
प्यासा सहरा
देख मुझको, उसके चेहरे पे हंसी है,
प्यासा सहरा मैं,उफनती वो नदी है।
राहे-सब्रे- इश्क़ का इक मुसाफ़िर मैं,
वो हवस की महफ़िलों में जा छिपी है।
सौदा उसका बादलों से पट चुका है,
वो अंधेरों में शराफ़त ढूंढती है।
दिल पहाड़ो को मैंने कुर्बां किया है,
सोच में उसकी उंचाई की कमी है।
दिलेआशिक़ तो झिझकता इक समंदर,
हुस्न की कश्ती अदाओं से भरी है।
सोया हूं वादों के चादर को लपेटे,
खाट धोखेबाज़ी से हिलने लगी है।
महलों सा बेख़ौफ़ तेरा हुस्न हमदम,
इश्क़ की ज़द में झुकी सी झोपड़ी है।
दिल के दर को खटखटाता है तेरा ग़म,
दुश्मनी के दायरे में दोस्ती है।
होली का त्यौहार आने वाला है फिर,
उनकी आंखों की गली में दिल्लगी है।
दिल का मंदिर खोल कर रखती वो जब से,
दानी , कोठों की दुआयें थम गई हैं ।
प्यासा सहरा मैं,उफनती वो नदी है।
राहे-सब्रे- इश्क़ का इक मुसाफ़िर मैं,
वो हवस की महफ़िलों में जा छिपी है।
सौदा उसका बादलों से पट चुका है,
वो अंधेरों में शराफ़त ढूंढती है।
दिल पहाड़ो को मैंने कुर्बां किया है,
सोच में उसकी उंचाई की कमी है।
दिलेआशिक़ तो झिझकता इक समंदर,
हुस्न की कश्ती अदाओं से भरी है।
सोया हूं वादों के चादर को लपेटे,
खाट धोखेबाज़ी से हिलने लगी है।
महलों सा बेख़ौफ़ तेरा हुस्न हमदम,
इश्क़ की ज़द में झुकी सी झोपड़ी है।
दिल के दर को खटखटाता है तेरा ग़म,
दुश्मनी के दायरे में दोस्ती है।
होली का त्यौहार आने वाला है फिर,
उनकी आंखों की गली में दिल्लगी है।
दिल का मंदिर खोल कर रखती वो जब से,
दानी , कोठों की दुआयें थम गई हैं ।
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